नईदिल्ली(ए)। आदिवासी समुदाय का अपना लोक शासन, लोककला और संस्कृति है, लेकिन विडंबना है कि इस विरासत और परंपरा को जैसे-तैसे आदिवासी जन लोककथाओं और लोकलाओं के सहारे बचाए हुए हैं, क्योंकि अब तक किसी भी सरकार ने इसके दस्तावेजीकरण के लिए सोचा ही नहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर 15 नवंबर, 2024 को जब रांची गए तो आव्हान किया कि आदिवासी संस्कृति का दस्तावेजीकरण आवश्यक है। उस पर पहल पंचायतीराज मंत्रालय ने की और झारखंड सरकार के साथ मिलकर ‘हमारी परंपरा, हमारी विरासत’ अभियान शुरू किया गया। इसकी निगरानी के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित कर चुका पंचायतीराज मंत्रालय अब अन्य नौ पेसा अधिसूचित राज्यों में भी आदिवासियों की संस्कृति और परंपराओं का दस्तावेजीकरण कराने जा रहा है।
पंचायतीराज मंत्रालय और झारखंड सरकार मिलकर कर रहे काम
पंचायतीराज मंत्रालय और झारखंड पंचायतीराज विभाग ने संयुक्त रूप से 26 जनवरी, 2025 को ‘हमारी परंपरा, हमारी विरासत’ अभियान शुरू किया। मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि इस कार्य के लिए राज्य सरकार द्वारा लगाई गई टीम के साथ विभिन्न अनुसूचित जनजाति समुदायों की पारंपरिक शासन व्यवस्था के अभिन्न अंग, सांस्कृतिक विरासत, लोकगीत, त्योहारों और पूजा-प्रथाओं को साझा किया जा रहा है।

मोदी सरकार के प्रयास से होगा दस्तावेजीकरण
उल्लेखनीय है कि पेसा अधिनियम, 1996 भी अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को आदिवासी रीति-रिवाजों, परंपराओं और स्वशासन की रक्षा करने का अधिकार देता है। यह दीगर बात है कि पेसा अधिनियम को लागू करने को लेकर भी अधिकतर राज्य अब जाकर मोदी सरकार के प्रयास से सक्रिय हुए हैं। दशकों तक रही इस उपेक्षा की पीड़ा झारखंड के खूंटी जिला निवासी मुंडा समुदाय के प्रधान महादेव मुंडा के शब्दों में छलकती है।
हमारा कोई धर्मग्रंथ नहीं- आदिवासी नेता
वह कहते हैं कि हमारा कोई धर्मग्रंथ नहीं है। इतिहास भी सिर्फ लोककलाओं और लोक कथाओं तक सीमित है। यहूदियों और मुगलों के बाद अंग्रेजों ने हमारी संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया। अंग्रेजों ने इतिहास लिखा तो उसमें परंपराओं को शामिल नहीं किया। अब मोदी सरकार ने जिस तरह विरासत के दस्तावेजीकरण की पहल की है, उससे कुछ आस जरूर बंधी है।